1975 आपातकाल शासन में आरएसएस ने इंदिरा गाँधी
की चाकरी की और अब अघोषित आपातकाल राज!
(आरएसएस
के मुखिया,
देवरस, दुवारा
इंदिरा गाँधी
को आपातकाल
के समर्थन
में लिखे
गए पत्रों
के मूल
पाठ के
साथ)
एक
हिंदुत्व गुरुकुल (यूनिवर्सिटी) के तौर पर, RSS अपने कार्यकर्ताओं को खुलेआम झूठ
बोलने और इतिहास को मनगढ़ंत तरीके से पेश करने की ट्रेनिंग देने में माहिर है।
इसका ताज़ा सबूत इमरजेंसी [1975-77] की 51वीं बरसी पर देखने को मिला, जब कई RSS-BJP नेताओं ने हमें बताया कि RSS इमरजेंसी से कितनी नफ़रत करता था, उसके कार्यकर्ताओं
ने इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन का कितनी बहादुरी से सामना किया और
इमरजेंसी-विरोधी आंदोलन के दौरान कितनी बड़ी कुर्बानियां दीं। अख़बारों में 'संविधान हत्या दिवस' के विज्ञापन भरे पड़े हैं,
जिनमें प्रधानमंत्री मोदी को संविधान के सामने सिर झुकाते हुए
दिखाया गया है।
[The Indian Express, जून 25, 2026]
आरएसएस
के अनुसार देश में प्रजातंत्र बचा हुवा है कियोंकी "सरकार चला रहे नेता
(आरएसएस से जुड़े) उनमें से
हैं जिन्हों ने [आपातकाल के ख़िलाफ़] आज़ादी की लड़ाई लड़ी। वे उदारवादी प्रजातान्त्रिक
मूल्यों के प्रति समर्पित हैं, किसी मजबूरी की वजह से नहीं बल्कि एक धर्मसिद्धान्त
के तौर पर।"
यानि
भाजपा-आरएसएस से जुड़े शासक उदारवादी प्रजातान्त्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित
हैं और उन्हों ने आपातकालीन शासन के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी। ये दोनों
दावे शर्मनाक झूट हैं क्योंकि आरएसएस-भाजपा राज में एक तरह से
अघोषित आपातकाल लागू है जिसका शिकार, आम लोग, राजनैतिक/सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार,
मज़दूर/छात्र/महिला/शिक्षक/किसान संगठन, दलित, अल्प-सांखियक समुदाय, यहाँ तक कि अदालतें
भी हो रही हैं। विश्व में प्रजातंत्र को मापने के जो माप-दंड हैं उन के अनुसार मोदी
राज में भारत की गिनती तानाशाही वाले देशों के साथ की जा रही है।
यह बिला वजह नहीं है। आरएसएस
से जुड़े मौजूदा भारत के शासकों की रगों में तानाशहों वाला खून दौड़ता है और इस का श्रेय
आरएसएस के सब से अहम दार्शनिक गोलवलकर को जाता है। यह वही गुरु गोलवलकर हैं जिन्हें
'नफ़रत का गुरु' भी कहा जाता है। यही वह गुरु भी हैं जिन्हें मोदी जी अपने आप को एक
कुशल राजनैतिक नेता में ढलने का श्रेय भी देते हैं। गोलवालकर ने 1940 में ही आरएसएस
के 1350 उच्चस्तरीय कार्यकर्ताओं के सामने भाषण करते हुए घोषणा कर दी थी कीः
"एक ध्वज के नीचे, एक नेता के मार्गदर्शन
में, एक ही विचार से प्रेरित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की प्रखर ज्योति
इस विशाल भूमि के कोने-कोने में प्रज्जवलित कर रहा है।"
याद
रहे कि एक झण्डा, एक नेता और एक विचारधारा का यह नारा सीधे यूरोप की नाजी एवं फ़ासिस्ट
पार्टियों, जिनके नेता क्रमशः हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह थे, के कार्यक्रमों से
लिया गया था।
भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल घोषित
किया था। यह 19 महीने तक लागू
रहा। इस दौर को भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में काले दिनों के रूप में याद किया जाता
है। इंदिरा गांधी का दावा था कि जयप्रकाश नारायण ने सशस्त्र बलों से कहा था कि कांग्रेस
शासकों के 'अवैध' आदेशों को नहीं मानें। इसने देश में अराजकता की स्थिति
उत्पन्न कर दी और भारतीय गणतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। इसलिए संविधान के
अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित
करने के अतिरिक्त कोर्इ विकल्प नहीं रह गया था।
आरएसएस का दावा है कि उसने इंदिरा गंधी द्वारा
घोषित आपातकाल का बहादुरी के साथ मुकाबला किया
और भारी दमन का सामना किया। बहरहाल, उस दौर के अनेक कथानक हैं, जो आरएसएस के इन दावों
को झुठलाते हैं। यहां हम ऐसे दो दृष्टांतों का उल्लेख कर रहे हैं। इनमें से एक वरिष्ठ
भारतीय पत्रकार और विचारक प्रभाश जोशी
हैं और दूसरे, पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) प्रमुख
टीवी राजेश्वर हैं, जिनके द्वारा बतार्इ घटनाओं का जिक्र हम यहां करेंगे। आपातकाल जिस
समय घोषित किया गया था राजेश्वर आईबी के उप प्रमुख थे। राजेश्वर ने आपातकाल काल के
उस दौर के बारे में बताया है किस तरह से आरएसएस ने इंदिरा गांधी के दमनकारी शासन के सम्मुख घुटने टेक दिए थे और इंदिरा
गांधी एवं उनके पुत्र संजय गांधी को 20-सूत्रीय कार्यक्रम पूरी
वफ़ादारी के साथ लागू करने का आश्वासन था। आएसएस के अनेक 'स्वयंसेवक' 20-सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने के रूप
में माफिनामें पर दस्तख़त कर जेल से छूटे थे।
इन तमाम ग़द्दारीयों के बावजूद,
ये आरएसएस वाले आपातकाल के दौरान उत्पीड़न के एवज में आज मासिक पेंशन प्राप्त कर रहे
हैं। भाजपा शासित राज्यों, जैसे कि- गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उन लोगों को 10,000 रुपये मासिक पेंशन देने का फैसला लिया गया है जिन्हें
आपातकालीन अवधि के दौरान एक महीने से कम समय तक जेल में रखा गया था। और आरएसएस से जुड़े
जो लोग इस दौरान 2 माह से कम अवधि के जेल गए थे उन्हें बतौर 20000 रुपये
पेंशन देना तय किया गया है। इस नियम में उन 'स्वयंसेवकों' का ख्याल रखा गया है, जिन्होंने
केवल एक या दो महीने जेल में रहने के बाद घबरा कर दया याचिका पेश करते हुए माफीनामे
पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस पेंशन के लिए ऐसी कोर्इ शर्त नहीं है कि लाभार्थी आपातकाल
के पूरे दौर में जेल में रहा हो।
खास बात यह है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद
के खिलाफ़ देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल में रहने वालों को मिलने वाली स्वतंत्रता
सेनानी पेंशन पाने वालों में से एक भी आरएसएस का 'स्वयंसेवक' नहीं है। यहां एक तथ्य
गौरतलब है कि उन सैकड़ों कम्युनिस्ट युवकों का किसी को ख्याल तक नहीं है जिन्हें आपातकाल
के इस दौर में नक्सलपंथी कह कर फर्जी मुठभेड़ों मे मार दिया गया था। यहां एक और रोचक
तथ्य है कि आरएसएस के हिंदुत्व सह-यात्री शिवसेना
ने खुले आम आपातकाल का समर्थन किया था।
प्रभाश जोशी का लेख अंग्रेजी साप्ताहिक 'तहलका'
में आपातकाल की 25 वीं वर्षगांठ
पर छपा थाi । उनके अनुसार आरएसएस
के आपातकाल विरोधी संघर्ष में सहभागिता को लेकर उस दौर में भी "मन ही मन हमेशा एक किस्म का संदेह, उसे के साथ कुछ दूरी, विश्वास के कमी" का भाव था। उन्होंने आगे बताया,
"उस समय के आरएसएस प्रमुख
बालासाहेब देवरस ने संजय गांधी के कुख्यात 20-सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने में सहयोग करने हेतु इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा था। यह
है आरएसएस का असली चरित्र...आप उनके काम
करने के अंदाज़ और तौर तरीकों को देख सकते हैं। यहां तक कि आपातकाल के दौरान, आरएसएस और जनसंघ के अनेक लोग माफीनामा देकर जेलों
से छूटे थे। माफी मांगने में वे सबसे आगे थे। उनके नेता ही जेलों में रह गए थे: अटल बिहारी वाजपेयी, एल के आडवाणी, यहां तक कि
अरुण जेटली। आरएसएस ने आपातकाल लागू होने के बाद उसके खिलाफ किसी प्रकार का कोर्इ संघर्ष
नहीं किया। तब, भाजपा आपात काल के खिलाफ संघर्ष की याद को अपनाने की कोशिश क्यों कर
रही है?"
प्रभाश जोशी के निष्कर्ष के अनुसार, "वे कभी संघर्षशील
शक्ति न तो रहे हैं न ही वे कभी संघर्ष के प्रति उत्सुक रहनों वालों में से हैं। वे
बुनियादी तौर पर समझौता परस्त रहे हैं। वे कभी भी सही मायने में सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष
करने वालों में नहीं रहे है।"
टी.वी. राजेश्वर सेवानिवृत्ति
के बाद उत्तर प्रदेश और सिक्किम के राज्यपाल रहे हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक 'इंडिया:
द क्रूशियल यिर्ज़' (हार्पर कॉलिन्स) में, इस तथ्य की पुष्टि की है कि "वह (आरएसएस) न केवल
इसका (आपातकाल) का समर्थन कर रहा था, वह श्रीमती गांधी के अलावा संजय गांधी के साथ
संपर्क स्थापित करना चाहता था।" राजेश्वर ने मशहूर पत्रकार, करन थापर के साथ एक मुलाकात में खुलासा किया कि देवरस ने "गोपनीय
तरीके से प्रधानमंत्री आवास के साथ संपर्क बनाया और देश में अनुशासन लागू करने के लिए
सरकार ने जो सख़्त कदम उठाए थे उनमें से कर्इ का मजबूती के साथ समर्थन किया था। देवरस
श्रीमती गांधी और संजय से मिलने के इच्छुक थे। लेकिन श्रीमती गांधी ने इनकार कर दिया।"
राजेश्वर की पुस्तक
के अनुसार, "आरएसएस, एक दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, आपातकाल के समय
इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन इसके प्रमुख बाला साहेब देवरस ने लागू आदेशों
और देश में अनुशासन को लागू करने के लिए सरकार के अनेक आदेशों का मजबूती के साथ समर्थन
किया था। संजय गांधी के परिवार नियोजन अभियान और इसे विशेष रूप से मुसलमानों के बीच
लागू करने के प्रयासों का देवरस का भरपूर समर्थन हासिल था।"
राजेश्वर ने
यह तथ्य भी साझा किया है कि आपातकाल के बाद भी "संघ (आरएसएस) ने आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को अपना
समर्थन विशेष रूप से व्यक्त किया था।" यह खास तौर
पर गौरतलब है कि सुब्रमण्यम स्वामी जो अब आरएसएस के प्यादे हैं के अनुसार भी आपातकाल
की अवधि में, आरएसएस के अधिकांश
वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के साथ गद्दारी की थी।
आरएसएस अभिलेखागार में समकालीन दस्तावेज प्रभाष जोशी और राजेश्वर
के कथन की सत्यता प्रमाणित करते हैं। आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक, मधुकर दत्तात्रय
देवरस ने आपातकाल लगने के दो महीने के भीतर इंदिरा गांधी को पहला पत्र लिखा था। यह
वह समय था जब राजकीय आतंक चरम पर था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 22 अगस्त, 1975 की शुरुआत
ही इंदिरा
की प्रशंसा के साथ इस तरह की:
"मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल किले से देश के नाम आपके संबोधन को जेल
(यारवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने
आपको यह पत्र लिखने का फैसला किया।"
इंदिरा गांधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया।
देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दिए गए निर्णय
के लिए बधार्इ के साथ की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनको चुनाव में भ्रष्ट साधनों
के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य करार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा,
"सुप्रीम कोर्ट
के सभी पांच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक
बधाई।" गौरतलब है कि विपक्ष का दृढ़
मत था कि यह निर्णय कांग्रेस के द्वारा 'मैनेज्ड' था। देवरस ने अपने इस पत्र में यहां तक कह दिया कि "आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन
के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन
के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया है...संघ का इन आंदोलनों
से कोई संबंध नहीं है ..."
इंदिरा गांधी ने क्योंकि देवरस के इस पत्र का भी जवाब
नहीं दिया, आरएसएस प्रमुख
ने विनोबा भावे के साथ संपर्क साधा, जिन्होंने आपातकाल का आध्यात्मिक समर्थन और इंदिरा
गांधी का पक्ष लिया था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 12 जनवरी, 1976 में, आचार्य विनोबा भावे से गिड़गिड़ाते
हुए आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गांधी को सुझाव दें।ix आचार्य विनोबा
भावे ने भी पत्र का जवाब नहीं दिया, हताश देवरस ने
तो उन्हों ने एक और पत्र लिखा जिस पर तिथि भी अंकित नहीं है। उन्होंने लिखा:
"अखबारों में छपी सूचनाओं
के अनुसार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) 24 जनवरी को वर्धा पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं।
उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे
याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो गलत धारणा घर कर गर्इ है
आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों
में बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रगति और विकास में
सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।"
इस काल में आरएसएस न किस तरह इंदिरा गांधी और
संजय गांधी की चाकरी की उस की गवाही
आरएसएस के एक वरिष्ठ विचारक बलराज माधोक ने भी इन शब्दों में की:
“देश में आपातकालीन वाले काल में संघ के सरसंघचालक श्री बाल साहेब
देवरस पूना के यरवादा जेल में MISA बंदी थे...उनका
जीवन सुविधा-भोगी था। इसलिये उन्हों ने जेल इंदिरा गांधी को संघ के प्रति रुख़
बदलने और इस पर से प्रतिबंध हटाने के लिए 22-08-1975 और 10-11-1975 को दो पत्र
लिखे। उन्हों ने श्री विनोबा भावे को भी पत्र लिखकर प्रार्थना की कि वे इंदिरा
गांधी के मन से संघ के प्रति विरोध का भाव दूर करने का प्रयत्न करें। सरकार की ओर
से इन पत्रों को लीक कर दिया गया और वे केई समाचार पत्रों में छप गए। इसका
स्वाभाविक रूप से संघ के स्वयंसेवकों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ा और सत्याग्रह
आंदोलन मृतप्राया हो गया।”
[Madhok,
Balraj, Zindagi
Ka Safar
–3: Deendayal Upadhyay Ki Hatya Se Indira Gandhi Ki Hatya Tak (Journey
of Life-3: From the Murder of Deendayal Upadhyay to the Murder of Indira
Gandhi), Dinman Prakashan, 2003, pp. 188-189.]
आरएसएस को आपातकाल के मुजरिमों को गले लगाने में भी कोई
एतराज़ नहीं रहा है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति
प्रणब मुखर्जी को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2018 में स्वयंसेवकों के दीक्षा समारोह
के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। प्रणब मुखर्जी की गिनती आपातकाल के दौरान
हुई ज्यादतियों के लिए जिम्मदार सर्वोच्च कांग्रेसी नेताओं में होती है और शाह आयोग
ने भी आपातकाल की ज़्यादतियों के लिए उन्हें
प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार माना था। आरएसएस के
प्रधान कार्यालय पर प्रणब का सत्कार करते हुवे ज़ाहिर है आरएसएस को किसी भी तरह की लज्जा
नहीं आयी।
भारत की जानी-मानी वरिष्ठ पत्रकार और बेहतरीन
पॉलिटिकल कमेंटेटर कूमी कपूर ने पिछले 12 सालों में RSS-BJP के कामकाज का आकलन करते हुए साफ़ तौर पर लिखा:
“सत्ता में बैठे लोग अब यह मानने लगे हैं कि वे
सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। NEET और CBSE परीक्षाओं में हुई बड़ी गड़बड़ियों, जिनसे लाखों छात्र प्रभावित हुए, उन पर सरकार की
चुप्पी इसका एक बड़ा उदाहरण है। आज की सरकार जनता की शिकायतों का जवाब देने को
कमजोरी मानती है। सत्ताधारी पार्टी के भीतर आंतरिक बहस की कमी भी चिंताजनक है। BJP
संसदीय बोर्ड की बैठकें बहुत कम होती हैं और जब होती भी हैं,
तो वे सिर्फ़ दूसरी जगहों पर लिए गए फैसलों पर अपनी मुहर लगाती हैं।
बिना किसी पहले सलाह-मशविरे के अनुभवहीन जूनियर पार्टी नेताओं को मुख्यमंत्री
बनाना, पार्टी के भीतर लोकतंत्र की कमी का एक और उदाहरण है।
लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए बनी संवैधानिक संस्थाओं की आज़ादी और
ईमानदारी का गिरता स्तर भी कम चिंताजनक नहीं है।
“चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से
90 लाख से ज़्यादा नाम बिना वजह हटा दिए, जिससे उस
चुनाव पर सवालिया निशान लग गया जिसमें जनता का मूड साफ़ तौर पर ममता बनर्जी के
ख़िलाफ़ था... सच्चे लोकतंत्र का मूल आधार है वोट के ज़रिए संसद में बहुमत हासिल
करना, न कि चुनाव के बाद किसी भी तरह से—चाहे तरीका सही हो
या गलत—विपक्षी विधायकों को अपने पाले में करना। दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के इस
बेरहम अभियान के बीच, इंदिरा गांधी का वह दौर याद आता है जब
उन्होंने अपने भारी-भरकम दो-तिहाई बहुमत का इस्तेमाल करके हमारे संविधान को कमज़ोर
किया था और इमरजेंसी लागू की थी।
“जब देश इमरजेंसी की 50वीं बरसी मना रहा है, तो सत्ताधारी पार्टी के कई समर्थक इंदिरा गांधी के दौर में इमरजेंसी के
दौरान हुई ज्यादतियों का ज़िक्र करते हुए भविष्य की पीढ़ियों को चेतावनी देते हैं
कि वे उस बदनाम रास्ते पर न चलें और लोकतंत्र को पटरी से न उतारें। विडंबना यह है
कि इमरजेंसी के दौरान अपनाए गए कई तौर-तरीके आज भी अपनाए जा रहे हैं। विज्ञापनों,
होर्डिंग्स और सार्वजनिक कार्यक्रमों में शासकों की ज़रूरत से
ज़्यादा चापलूसी भी उस काले दौर की बुरी याद दिलाती है और कांग्रेस अध्यक्ष डी.
के. बरुआ के उस चापलूसी भरे नारे की याद ताज़ा करती है: ‘इंदिरा ही भारत हैं और
भारत ही इंदिरा है’।”
[Coomi Kapoor, ‘Five decades after the
Emergency, difficult questions, unheeded warnings’, The Indian Express,
Delhi, June 25, 2026. https://indianexpress.com/article/opinion/columns/when-a-home-of-her-own-is-a-womans-lifeline-10750871/?ref=infinite]
विश्व के सब से बड़े जनतंत्र का विनाश हम सब के सामने
है। भारत में संविधान के कुछ अनुच्छेदों (352-360) का इस्तेमाल करके इमरजेंसी लगाई
गई थी और बाद में उसे हटा भी लिया गया था। आज, इंदिरा गांधी और
कांग्रेस सरकार के बिना, आरएसएस के सब से शक्तिशाली हस्ती मोदी
के राज में एक तरह की 'अघोषित' इमरजेंसी
लगातार चल रही है। इसे हटाने की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि इसे कभी घोषित ही नहीं
किया गया था!
शम्सुल इस्लाम
25 जून, 2026
शम्सुल इस्लाम
के
अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, मराठी, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, पंजाबी, गुजराती
में
लेखन
और
कुछ
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साक्षात्कार/बहस के लिए
देखें
:
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Twitter: @shams4equality
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शम्सुल इस्लाम की अंग्रेज़ी, हिन्दी और उर्दू किताबें प्राप्त करने के लिये लिंक:
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देवरस के सभी पत्र आरएसएस के एक प्रकाशन से लिए गए हैं
जिनका स्कैन्ड रूप यहाँ प्रस्तुत है ।
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