Wednesday, December 6, 2023

बाबरी मस्जिद विध्वंस के 31 साल बाद: हिंदुतवादी आपराधिक तत्वों को सज़ा मिलना तो दूर वे देश पर राज कर रहे हैं!

 

बाबरी मस्जिद विध्वंस के 31 साल बाद: हिंदुतवादी आपराधिक तत्वों को सज़ा मिलना तो दूर वे देश पर राज कर रहे हैं!

     आरएसएस के प्रचारक, धुर-संघी नरेन्द्र मोदी के निजी नेतृत्व में चल रही आरएसएस-भाजपा की मौजूदा सरकार 138 करोड़ भारतीयों (जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत हिंदू हैं) को रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और शांति देने में तो बुरी तरह से नाकामयाब है, लेकिन देशवासियों का मन बहलाने के लिए 5 (2020) अगस्त को उसके पास एक शुभ समाचार था। किसी मध्यकालीन राजा की वेशभूषा में, एक हिन्दू ऋषी दिखने की कामना लिए, केसरिया लबादा लपेटे प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखते हुए ऐलान किया कि दुनिया भर के हिंदुओं की चिरप्रतिक्षित अभिलाषा आखिरकार पूरी हुई, भगवान राम की जन्मभूमि जिसे नष्ट करने के लिए सैकड़ों साल से कोशशें की जा रही थीं, आखिरकार वह मुक्त हो गयी। बकौल उनके मंदिर की नींव में जिस क्षण आधारशिला रखी जा रही थी, भारत  एक "सुनहरा अध्याय" लिख रहा था। यह समझना जारी भी मुश्किल नहीं था की भारत से मतलब ख़ुद वे थे।  उन्होंने ऐलान किया कि "आज, राम जन्मभूमि सदियों से चले आ रहे विध्वंस और पुनरुत्थान के चक्र से मुक्त हो गई।"

[Https://indianexpress.com/article/india/ram-mandir-bhumi-pujan-full-text-of-pm-narendra-modis-speech-in-ayodhya/]

गोस्वामी तुलसीदास पर प्रश्नचिन्ह

     हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर झूठ बोलते पाये जाते हैं। बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए राम जन्म-स्थान मंदिर के विध्वंस को लेकर भी उन्होंने झूठ का सहारा लिया। उन्होंने इस बारे में जो कहा वह आरएसएस की शाखाओं में घढ़े 'सच' हैं जिनका इतिहास के समकालीन 'हिन्दू' दस्तावेज़ों और स्त्रोतों में भी वर्णन नहीं है। उन के अनुसार, अयोध्या ने राम मंदिर को लेकर हिंदू और मुसलमानों के बीच लगभग पांच शताब्दियों तक लगातार युद्ध चला आ रहा था।

     विरोधियों (मुसलमानों) पर जीत की शेखी बघारते समय, मोदी ने अवधी भाषा में रचित, गोस्वामी तुलसीदास के महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' को पूरी तरह दरकिनार कर दिया । यह वही महाकाव्य है, जिसने भगवान राम की कहानी को लोकप्रिय करके हर हिंदू के मन-मंदिर में प्रतिष्ठित किया है, विशेषकर उत्तरी भारत में । गोस्वामी तुलसीदास ने 1575-76 में इस महाकाव्य की रचना की थी। हिंदुत्ववादियों के दावे के अनुसार राम जन्म-स्थान मंदिर 1538-1539 के दौरान नष्ट किया गया था। तब, राम जन्मस्थान मंदिर के कथित विध्वंस के लगभग 37 साल बाद लिखे गए 'श्रीरामचरितमानस' में इस विध्वंस का उल्लेख होना चाहिए था। लेकिन 'श्रीरामचरितमानस' में ऐसा कोई जिक्र नहीं है।

     यह सब करके क्या हिंदुत्व के ठेकेदार जिन की अगवाही मोदी कर रहे हैं यह जतलाने की कोशिश कर रहे हैं कि भगवान राम के सबसे बड़े कथाकार और भक्त तुलसीदास ने अपनी इस ऐतिहासिक रचना में जानबूझ कर सत्य नहीं बताया ? क्या यह गोस्वामी तुलसीदास की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की कोशिश नहीं है? क्या हिंदुत्व के ठेकेदार यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि गोस्वामी तुलसीदास राम के जन्म-स्थान पर मंदिर के विध्वंस के विषय पर किसी प्रच्छन्न उद्देश्य से मौन रह गये?

यहाँ यह जानना भी मुनासिब होगा की गोस्वामी तुलसीदास के 3 क़रीबी लोगों ने उनकी जीवनियां लिखीं हैँ लेकिन उनमें भी राम जनम-स्थान पर किसी मस्जिद के बनाए जाने का ज़िक्र नहीं है। 

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवमानना
    
राम जन्मभूमि "विध्वंस और पुनरुत्थान की सदियों पुरानी श्रृंखला से मुक्त हुर्इ", यह दावा करके प्रधानमंत्री अयोध्या पर 9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले की खुले-आम धज्जियाँ उड़ा रहे थे। अपने इस निर्णय में न्यायालय ने कहा है, बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी भी मंदिर को ध्वस्त कर नहीं किया गया था। 22/23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि को राम लला की मूर्ति रखना गैरकानूनी था और 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस "कानून के शासन का उद्दंड उल्लंघन" था। इसी फैसले में यह तथ्य भी रेखांकित किया गया है कि "मुसलमानों को गलत तरीके से एक मस्जिद से वंचित किया गया है जो 450 साल पहले बाकायदा निर्मित की गर्इ थी"। दरहकीकत, अयोध्या में प्रधानमंत्री के भाषण के लिए न्यायालय में उनके खिलाफ न्यायिक अवमानना का मुकदमा चल सकता है।

यहाँ इस शर्मनाक पहलू पर भी विचार करना ज़रूरी है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त फ़ैसले के बावजूद जिन तत्वों ने दिसम्बर 6, 1992 को मस्जिद तोड़ी थी उन्हें ही मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने की इजाज़त दी!

[Https://scroll.in/article/943337/no-the-supreme-court-did-not-uphold-the-claim-that-babri-masjid-was-built-by-demolishing-a-temple]

इतिहास के ज़ुल्मों का बदला लेने का हिन्दुत्ववादी तरीक़ा 

हमने देखा की कैसे एक बेबुनियाद और ग़ैर-ऐतिहासिक मनघड़ंत कथा के आधार पर बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम मंदिर बनाया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी की आरएसएस-भाजपा सरकार का दावा है की वह अतीत की गलतियों को दुरुस्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस से जुड़े कई गंभीर पहलू हैं जिन को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है । इस की सब से बड़ी समस्या यह है की भारतीय सभ्यता, जिसे खुद आरएसएस कम-से-कम 5000 साल पुरानी बताता है, उसमें से केवल 700-800 का काल [जब भारत पर शासन/आक्रमण करने वाले मुुस्लिम नामधारी रहे हैं या 'मुस्लिम, काल] को ग़लतियां सुधारने के लिए चुना गया है। जैसे की शेष 4200-4300 सालों में जब मुसलमान भारत नहीं पहुंचे थे सब ठीक था। आइए हम देश के इतिहास में की गयीं नाइंसाफ़ियों के बारे स्वयं 'हिन्दू' स्त्रोत किया बताते हैं उनका जायज़ा लेते हैं।  

इस सन्दर्भ में आरएसएस/हिंदुत्व के सबसे महत्वपूर्ण विचारक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख, एम. एस गोलवलकर ने महमूद गजनी द्वारा 1025-26 में सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के बारे में क्या लिखा था उसे जानना ज़रूरी है, उनके अनुसार:

‘‘एक हजार वर्ष पहले हमारे लोगों ने हम पर आक्रमण करने के लिए विदेशीयों को आमंत्रित किया। आज भी ऐसा ही खतरा हमारे ऊपर मंडरा रहा है। कैसे सोमनाथ के भव्य मंदिर को अपवित्र किया गया एवं ध्वस्त किया गया, यह तो इतिहास की बात हो चुकी है। महमूद गाजी ने सोमनाथ की संपत्ति एवं वैभव के बारे में सुना था। उसने ख़ैबर दर्रे को पार किया और सोमनाथ की संपदा को लूटने के लिए भारत में अपना पैर रखा। उसे रेगिस्तान के भारी जंगल को पार करना पड़ा। एक ऐसा समय भी था जब उसके पास अपनी सेना के लिए और अपने लिए भी भोजन एवं पानी नहीं था, उसे अपनी नियति पर छोड़ दिया गया होता तो वह खत्म हो गया होता और राजस्थान के जलते बालू (रेत) ने उसकी हड्डियों को जलाकर ख़ाक कर दिया होता । लेकिन नहीं, महमूद गज़नी ने स्थानीय सरदारों को यह विश्वास दिला दिया कि सौराष्ट्र के शासक उनके खिलाफ विस्तारवादी इरादा रखते है, उन्होंने अपनी मूर्खता तथा संकीर्णता के चलते उस पर विश्वास कर लिया और वे उसके साथ हो लिये। जब महमूद गाजी ने महान मंदिर पर हमला किया तो वे हिन्दू थे, हमारे रक्त के रक्त, हमारे हाड़-मांस, हमारी आत्मा की आत्मा जो उसकी सेना के हिरावल थे। सोमनाथ को हिन्दुओं के सक्रिय सहयोग से अपवित्र किया गया। ये इतिहास के तथ्य हैं।"

 [MS Golwalkar’s speech in Madurai cited in ‘Organiser’ dated January 4, 1950, pp. 12, 15.]

     यदि आरएसएस-भाजपा सरकार भारत के अतीत में की गर्इ धार्मिक नाइंसाफियों को दुरुस्त करने को लेकर सचमुच संजीदा हैं, तो उन्हें पुरी में जगन्नाथ मंदिर को बौद्धों को सौंपने के लिए काम तत्काल शुरू कर देना चाहिए। स्वामी विवेकानंद को आरएसएस हिंदुत्व की राजनीति और पुनरुत्थानवादी हिंदू भारत का पथप्रदर्शक मानता है। भारत के महान अतीत के बारे उन्होंने बहुत कुछ बताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों कहा है कि पुरी का जगन्नाथ मंदिर मूल रूप से एक बौद्ध मंदिर था। उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार,

"किसी भी व्यक्ति के लिए जो भारतीय इतिहास के बारे में जानता है...जगन्नाथ एक प्राचीन बौद्ध मंदिर है। हमने इसे और अन्यों को अपने नियंत्रण में ले लिया एवं उनका हिन्दूकरण कर दिया। हमें अभी उसकी तरह के अनेक काम करने होंगे।"

[Swami Vivekananda, ‘The Sages of India’ in The Complete Works of Swami Vivekananda, Vol. 3, Advaita Ashram, Calcutta, p. 264.]

     हिंदुत्व टोली के एक और बहुत प्यारे बंकिम चंद्र चटर्जी ['आनंदमठ' और 'वंदे मातरम' के लेखक] हैं जो इसी तथ्य को पुष्ट करते हैं। उनके अनुसार, जगन्नाथ मंदिर का एक अभिन्न हिस्सा 'रथ यात्रा', मूल रूप से एक बौद्ध अनुष्ठान था जिसे बौद्ध मंदिर के हिन्दुकरण के बाद भी जरी रखा गया । बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा:

     "जनरल कनिंघम द्वारा 'भिल्सा टॉप्स' नामक अपने ग्रंथ में रथ उत्सव (जगन्नाथ मंदिर से संबंधित) की उत्पत्ति के बारे में जो विवरण दिया है उस संदर्भ में मुझे एक और अत्यंत प्रमाणित कथा ज्ञात है। इसमें वे बौद्धों के इसी प्रकार के उत्सव के बारे में बताते हैं, जिसमें बौद्ध धर्म के तीन प्रतीक, बुद्ध, धर्ममा और संघ, इसी रूप में एक वाहन में दर्शाए गए थे, और मैं समझाता हूं कि समय भी वही है, जब रथ (यात्रा) निकलती है। इस व्याख्या के समर्थन में एक तथ्य है कि जगन्नाथ, बालराम, और सुभद्रा, जिनकी झांकी अब रथ में प्रदर्शित होती हैं, बुद्ध, धर्ममा और संघ की ही लग-भग नक़ल हैं ।"

[Chatterjee, Bankim Chandra, 'On the origin of Hindu festivals' in Essays & Letters, Rupa, Delhi, 2010, pp. 8-9.]

     दरअसल, केवल पुरी मंदिर ही नहीं है जिस का हिन्दुकरण किया गया। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'सत्यार्थ प्रकाश' में शंकराचार्य का यशगान करते हुए बताया:

     "दस वर्ष उन्होंने (शंकराचार्य ने) देश भ्रमण किया, जैन धर्म का खंडन किया और वैदिक धर्म का प्रसार किया। धरती में से जो भी खंडित मूर्तियां खोद कर निकाली जाती हैं, शंकर के काल में तोड़ी गयी थीं और खुदाई के दौरान जहां अखंडित मूर्तियां यहाँ-वहां निकलती हैं, तोड़े जाने के डर से जैनियों (जैन धर्म छोड़ चुके) ने ही जमीन में गाड़ दी थीं। "

(SATYARTH PRAKSHBY Swami Dayanand Sarswati, chapter  xi, p. 347.)
हिंदुत्ववादी शासक, जो बौद्ध और जैन धर्म जैसे धर्मों को स्वदेशी मानकर अपनत्व जतलाया करते हैं, उन्हें चाहिए कि जैन मंदिरों और बौद्ध विहारों को जल्द से जल्द उनके धर्मावलंबियों को सौंपने की शुरुआत करें।  

शम्सुल इस्लाम

06 दिसम्बर, 2023

एस. इस्लाम के अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, मराठी, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, पंजाबी, गुजराती में लेखन और कुछ वीडियो साक्षात्कार/बहस के लिए देखें:

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[अनुवाद : कमलसिंह]

 

31 YEARS AFTER BABRI MOSQUE DEMOLITION: CRIMINAL HINDUTVA PERPETRATORS INSTEAD OF BEING PUNISHED RULE INDIA!

 

31 YEARS AFTER BABRI MOSQUE DEMOLITION

CRIMINAL HINDUTVA PERPETRATORS INSTEAD OF BEING PUNISHED RULE INDIA!

The RSS-BJP government of India led by a seasoned RSS whole-timer, Narendra Modi has miserably failed in providing basic amenities, employment, education, security and peace to 138 crores of Indians (out of which approximately 80% are Hindus ) but on August 5, 2020, he had a joyous news to share with the people of the country. While laying the foundation of Ram Temple at Ayodhya on August 5, 2020, with the get-up of a prosperous Hindu sage, Prime Minister declared that wait of Hindus of the world for centuries was over as Lord Ram’s birthplace was finally liberated from numerous attempts to destroy it. According to him India with his laying down the foundation of the Temple was  writing a “glorious chapter” and declared that "Today, the Ram Janmabhoomi [birth-place] has become free from the centuries-old chain of destruction and resurrection". It is interesting to note that Indian Head of the State, President Ram Nath Kovind was not invited, perhaps for the reason that his being Sudra would have been a bad omen for this Brahmanical ritual.

[https://indianexpress.com/article/india/ram-mandir-bhumi-pujan-full-text-of-pm-narendra-modis-speech-in-ayodhya/]

GOSWAMI TULSIDAS PUT IN BAD LIGHT

As generally happens with our PM, he resorted to lies regarding the destruction of Ram birth-place temple for building Babri Mosque too. According to his narrative, borrowed from the RSS shakhas, Ayodhya represented a continuous war between Hindus and Muslims over the Ram Temple for almost last five centuries.

While boasting of victory over the adversary (Muslims) he did not bother to look at the epic work of poetry in Avadhi language penned by Goswami Tulsidas, namely, RAMCHARITMANAS. This was the work which mesmerized India with the story of Lord Ram and the latter became house-hold deity of every Hindu home, specially, in North India.  He penned his above mentioned work during 1575-76. According to the Hindutva version Ram birth-place temple was destroyed during 1538-1539. Thus RAMCHARITMANAS written almost 37 years after the so called destruction of Ram birth-place temple should have mentioned this destruction. But it did not.

Are Hindutva zealots trying to say that the greatest story-teller and worshipper of Ram and his Court (Darbar), Tulsidas did not speak truth in his historic work? Is not it an attempt to question the credibility of Goswami Tulsidas? Are the Hindutva zealots trying to say that Goswami Tulsidas kept mum on the issue of the destruction of a temple at Ram's birth-place due to some ulterior motives?

CONTEMPT OF THE SUPREME COURT JUDGMENT

PM by claiming that the Ram Janmabhoomi [birth-place] "has become free from the centuries-old chain of destruction and resurrection" was openly contradicting the Supreme Court judgment on Ayodhya delivered on November 9, 2019 that Babri Mosque was not built after demolishing any temple, the appearance of idol of Ram Lalla on the intervening night of 22/23 December 1949 was illegal and the demolition of the Babri Masjid in Ayodhya on December 6, 1992 was an “egregious violation of the rule of law”. The same judgment underlined the fact that “Muslims have been wrongly deprived of a mosque which had been constructed well over 450 years ago”. In fact, PM should have been tried for contempt of the Court for his Ayodhya speech.

It is a different matter that despite all these findings the highest court of justice of India allowed construction of Ram Temple at the site of Babri Mosque. The more shameless was allowing Vishwa Hindu Parishad, a pocket organization of RSS which demolished the Mosque on December 6, 1992 to build the Temple!

[https://scroll.in/article/943337/no-the-supreme-court-did-not-uphold-the-claim-that-babri-masjid-was-built-by-demolishing-a-temple]

SELECTIVE REDRESSAL OF WRONGS OF HISTORY

The demolition of Babri Mosque and building of a grand Ram Temple at Ayodhya has been justified by the Hindutva flag-bearers claiming that justice was being done to the wrongs of history. However, the Indian past looked through the Hindu Muslim binary has its serious limitations. One major problem is that despite India being a five-thousand-year-old civilization but it is only the period 0f approximately 700-800 years in which people with the Muslim names ruled/attacked India is under scrutiny.

Let us get acquainted what the most important ideologue of the RSS-Hindutva and the second chief of it, MS Golwalkar wrote about destruction of Somnath Temple in 1025-26 by Mahmud Ghazni. According to him: 

“One thousand years back our people invited foreigners to invade us. A similar danger threatens us even today. How the glorious temple of Somnath was desecrated and devastated is a page of history. Mahmud Ghazi had heard of the wealth and splendour of Somnath. He crossed the Khyber Pass and set foot in Bharat to plunder the wealth of Somnath. He had to cross the great desert of Rajasthan. There was a time when he had no food and no water for his army, and even for himself left to his fate, he would have perished, and the burning sands of Rajasthan would have consumed his bones. But no, Mahmud Ghazi made the local chieftains to believe that Saurashtra had expansionist designs against them. In their folly and pettiness they believed him. And they joined him. When Mahmud Ghazi launched his assault on the great temple, it was the Hindu, blood of our blood, flesh of our flesh, soul of our soul-who stood in the vanguard of his army. Somnath was desecrated with the active help of the Hindus. These are facts of history.”

 [MS Golwalkar’s speech in Madurai cited in ‘Organiser’ dated January 4, 1950, pp. 12, 15.]

If RSS-BJP government is really serious about executing its core issue of undoing religious injustice in India's past then they should start working to hand over Jagannath Temple at Puri to Buddhists immediately. Swami Vivekananda who is regarded as an icon of the Hindutva politics and resurgent Hindu India by RSS who was also the greatest narrator of ancient India's past, unambiguously, declared that Jagannath Temple was originally a Buddhist Temple. According to his admission,

 “To any man who knows anything about Indian history…the temple of Jaganath [sic] is an old Buddhistic temple. We took this and others over and re-Hinduised them. We shall have to do many things like that yet. "

 [Swami Vivekananda, ‘The Sages of India’ in The Complete Works of Swami Vivekananda, Vol. 3, Advaita Ashram, Calcutta, p. 264.]

It has been corroborated by another darling of the Hindutva camp, Bankim Chndra Chatterjee. According to him RATH YATRA, an integral part of Jagganath Temple was a Buddhist ritual too. According to Bankim:

"I am aware that another, and a very reasonable, account of the origin of the festival of Rath [at the Jagganath Temple] has been given by General Cunningham in his work on the Bhilsa Topes. He there traces it to a similar festival of the Buddhists, in which the three symbols of the Buddhist faith, Buddha, Dharmma, and Sangha, were drawn in a car in the same fashion, and I believe about the same season as the Rath. It is a fact greatly in support of the theory, that the images of Jagannath, Balaram, and Subhadra, which now figure in the Rath, are near copies of the representations of Buddha, Dharmma, and Sangha, and appear to have been modelled upon them."

[Chatterjee, Bankim Chandra, 'On the origin of Hindu festivals' in Essays & Letters, Rupa, Delhi, 2010, pp. 8-9.]

In fact, Puri Temple was not the only one Hinduised. Founder of Arya Samaj, Swami Dayanand Saraswati while describing the heroics of Shankaracharya in SATYARTH PRAKASH:"

"For ten years he toured all over the country, refuted Jainism and advocated the Vedic religion. All the broken images that are now-a-days dug out of the earth were broken in the time of Shankar, whilst those that are found whole here and there under the ground had been buried by the Jainis for fear of their being broken (by those who had renounced Jainism)."

[SATYARTH PRAKSH BY Swami Dayanand Sarswati, chapter  xi, p. 347.]

 

The Hindutva rulers who declare their love for indigenous religions like Buddhism and Jainism should begin to handover their usurped temples and Vihars at the earliest to them.

Shamsul Islam

December 06, 2023

Link for some of S. Islam's writings in English, Hindi, Urdu, Marathi, Malayalam, Kannada, Bengali, Punjabi, Gujarati and video interviews/debates:

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