याद रहे आरएसएस ने भागत सिंह-राजगुरु-सुखदेव जैसे महान शहीदों के बारे कितनी घटिया बातें कहीं थीं!
भागत सिंह-राजगुरु-सुखदेव की महान शहादत की 95वीं बरसी पर आरएसएस के सब से प्रमुख विचारक गुरु गोलवलकर ने उनकी शहादत पर जो शर्मनाक विचार व्यक्त किए थे उन्हें याद रखें, परिवार और दोस्तों से साझा करें ताकि इंसानियत और राष्ट्र विरोधी आरएसएस से मौक़ा मिलने पर हिसाब चुकता किया जा सके। “निःसंदेह ऐसे व्यक्ति जो अपने आप को बलिदान कर देते हैं श्रेष्ठ व्यक्ति हैं और उनका जीवन दर्शन प्रमुखतः पौरुषपूर्ण है। वे सर्वसाधारण व्यक्तियों से, जो कि चुपचाप भाग्य के आगे समर्पण कर देते हैं और भयभीत और अकर्मण्य बने रहते हैं, बहुत ऊंचे हैं। फिर भी हमने ऐसे व्यक्तियों को समाज के सामने आदर्श के रूप में नहीं रखा है। हमने बलिदान को महानता का सर्वोच्च बिन्दु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करें, नहीं माना है। क्योंकि, अंततः वे अपना उदे्श्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी ।” [विचार नवनीत (Hindi edition of Bunch of Thoughts ), 1997, प्रष्ट 281 ]
यक़ीनन यही कारण है कि आरएसएस का एक भी स्वयंसेवक अंगे्रज़ शासकों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए शहीद होना तो दूर की बात रही; जेल भी नहीं गया।
गोलवलकर भारत मां पर अपना सब कुछ क़ुर्बान करने वालों को कितनी हीन दृष्टि से देखते थे इसका अंदाज़ा निम्नलिखित शब्दों से भी अच्छी तरह लगाया जा सकता है। श्री गुरुजी वतन पर प्राण न्यौछावर करने वाले महान शहीदों से जो प्रश्न पूछ रहे हैं ऐसा लगता है मानो यह सवाल अंगे्रज़ शासकों की ओर से पूछा जा रहा होः
“अंगे्रज़ों के प्रति क्रोध के कारण अनेकों ने अद्भुत कारनामे किये। हमारे मन में भी एकाध बार विचार आ सकता है कि हम भी वैसा ही करें। वैसा अद्भुत कार्य करने वाले निःसंदेह आदरणीय हैं। उसमें व्यक्ति की तेजस्विता प्रकट होती है। स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए शहीद होने की सिद्धता झलकती है। परन्तु सोचना चाहिए कि उससे (अर्थात बलिदान से) संपूर्ण राष्ट्रहित साध्य होता है क्या? बलिदान के कारण पूरे समाज में राष्ट्र-हितार्थ सर्वस्वार्पण करने की तेजस्वी वृद्धिगत नहीं होती है। अब तक का अनुभव है कि वह हृदय की अंगार सर्व साधारण को असहनीय होती है ।” Golwalkar,
M.S., Shri Guruji Samagar Darshan (collected works of Golwalkar in
Hindi), Bhartiya Vichar Sadhna, Nagpur, nd., volume 1, pp. 61-62.
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