Monday, June 22, 2026

क्या क़ानून से ऊपर है आरएसएस?

 

क्या क़ानून से ऊपर है आरएसएस?

  • शम्सुल इस्लाम 

नागपुर के ललन सिंह न्यायपालिका के दरवाज़े खटखटा रहे हैं, कि-  आखिर किन भारतीय नियमों के तहत आरएसएस प्रमुख को जेड प्लस सुरक्षा और इसके मुख्यालय को सीआईएसएफ का सुरक्षा कवच हासिल है, जिस पर टैक्स देने वाले आम भारतीयों के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं? और यह सब उस संगठन के लिए, जो रजिस्टर्ड भी नहीं है?!

लगता है कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस से सीधे दो-दो हाथ करने की ठान ली है। 13 जून 2026 को संघ प्रमुख मोहन भागवत को लिखे एक पत्र में वह कहते हैं:

जो संगठन रोज़ रोज़ राष्ट्रवाद, अनुशासन और कर्तव्य की बात करता है, उसे पारदर्शिता, नियमों के पालन और भारत के संविधान के प्रति सम्मान के ज़रिए इन मूल्यों का प्रदर्शन भी करना चाहिए। आरएसएस आम भारतीयों से नियमों का पालन करने के लिए नहीं कह सकता, जबकि वह खुद उन नियमों को नहीं मानता। अगर कार्यकर्ताओं, छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, एनजीओ, ट्रस्ट, कंपनियों और नागरिकों से रजिस्ट्रेशन कराने, जानकारी देने, ऑडिट का सामना करने और टैक्स भरने की उम्मीद की जाती है, तो आरएसएस को भी देश के नियम-क़ानूनों का पालन करके एक मिसाल कायम करनी चाहिए।

संघ को संविधान से बाहर मिली शक्तियों पर सवाल उठाना एक बहुत बड़ा कदम है। इसके तहत यह मांग की जा रही है कि संघ अपनी कानूनी स्थिति और फंड के स्रोतों का स्वयं खुलासा करे, और सबसे अहम बात वह सवाल कि उसे देश के कानूनों से छूट क्यों मिलनी चाहिए, इसका जवाब दे। आरएसएस आधिकारिक तौर पर दावा करता है कि भारत और विदेशों में उसकी 60,000 से ज़्यादा शाखाएं और करोड़ों कार्यकर्ता हैं। खड़गे लिखते हैं:

इसी व्यापकता, प्रभाव और पहुंच की वजह से आरएसएस को पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक नियमों के पालन के सर्वोच्च मानकों पर खरा उतरना चाहिए।

केरल में शताब्दी समारोह के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, भागवत ने इस पत्र को राजनीतिक हथकंडा बताकर खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें जवाब देने की ज़रूरत नहीं है और यह भी कि हिंदू धर्म रजिस्टर्ड नहीं है, या कि कई अन्य संस्थाएं भी बिना औपचारिक रजिस्ट्रेशन के काम करती हैं ऐसी ही कई और गोलमोल बातें। आरएसएस यह भी दावा करता है कि वह लोगों का एक समूह है, जो किसी कानून के तहत सोसाइटी, ट्रस्ट, एनजीओ, कंपनी या राजनीतिक दल के तौर पर रजिस्टर्ड नहीं है।

आरएसएस स्वयं को एक स्वैच्छिक सांस्कृतिक संगठन बताने का दिखावा करता रहा है। इसके अंग्रेज़ी मुखपत्र ऑर्गनाइज़र (6 फरवरी 2000) के एक संपादकीय के अनुसार: आरएसएस कोई राजनीतिक दल नहीं है। ...यह तो चुनावों में हिस्सा लेता है और ही इसके पदाधिकारी किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी बन सकते हैं। ...यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है जो सभी राष्ट्रीय गतिविधियों को प्रेरित करने की कोशिश करता है।

आरएसएस खुद को एक सांस्कृतिक संगठन बताता है, लेकिन अपने स्थापना दिवस पर हथियारों की पूजा करता है! अनेक सिरों वाले इस एनजीओ की तमाम शाखाएं और सहयोगी संगठन हैं। संघ साहित्य के सब से इस के अपने प्रकाशक रुचि प्रकाशन द्वारा 1997 में प्रकाशित किताब परम वैभव के पथ पर (लेखक: सदानंद डी. सप्रे) में आरएसएस द्वारा अलग-अलग कामों के लिए बनाए गए 40 से ज़्यादा सहयोगी और सहायक संगठनों की जानकारी दी गई है (पूरी सूची हमारी वेबसाइट पर देखें)

इनमें बीजेपी के साथ-साथ एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद), हिंदू जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद, स्वदेशी जागरण मंच और संस्कार भारती भी प्रमुखता से शामिल हैं। यह भी याद रखना ज़रूरी है कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री और लगभग सभी केंद्रीय मंत्री, बीजेपी के मुख्यमंत्री और राज्यपाल सार्वजनिक रूप से खुद को आरएसएस का सदस्य बताते हैं। इसके सांस्कृतिक संगठन होने के दावे की बस यहीं इतिश्री हो जाती है।

आरएसएस कैसे काम करता है, यह समझने की चाहत रखने वालों के लिए सप्रे की किताब कई नई बातें सामने लाती है और उनके लिए इसे पढ़ना ज़रूरी है। इसके कई सहयोगी और सहायक संगठन, उनकी गतिविधियों को लेकर भ्रम फैलाने की एक चालाक रणनीति का हिस्सा हैं। यह संगठन आरएसएस को आड़ भी देते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अलग होने का मौक़ा भी। उदाहरण के लिए, 1990 के दशक के आखिर में ईसाइयों पर हमले के लिए उसने हिंदू जागरण मंच का इस्तेमाल किया, और जब जन-भावना खिलाफ़ हो गई, तो आरएसएस ने उससे किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार कर दिया। जब कभी विहिप, बजरंग दल या विद्यार्थी परिषद की आपराधिक गतिविधियां सामने आती हैं, आरएसएस बड़ी आसानी से किनाराकशी करते हुए उन्हें स्वतंत्र संगठन बता देता है।

सप्रे लिखते हैं कि हिंदू जागरण अभियान के लिए हिन्दू जागरण मंच 17 राज्यों में अलग-अलग नामों से सक्रिय हैं, जैसे दिल्ली में हिंदू मंच, तमिलनाडु में हिंदू मुन्नानी, महाराष्ट्र में हिंदू एकजुट वगैरह। वह लिखते हैं कि ये मंच हैं, कि कोई एसोसिएशन या संगठन, इसलिए इनमें सदस्यता, रजिस्ट्रेशन या पदाधिकारियों के चुनाव की कोई ज़रूरत नहीं होती। (परम वैभव के पथ पर, पेज 64)

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि माफिया-स्टाइल वाला यह ढांचा कानूनी या प्रशासनिक जांच से बचने के लिए बनाया गया है। इन फ्रंट संगठनों के ज़रिए काम करने से आरएसएस को वह सुरक्षा मिल जाती है जिसकी उसे ज़रूरत होती है, ताकि हालात बिगड़ने या कभी-कभी कोई अप्रिय नतीजा सामने जाने पर वह खुद को उससे अलग रख सके।

बंटवारे के ठीक बाद दिल्ली के एक मामले को लेकर सप्रे लिखते हैं: स्वयंसेवकों ने दिल्ली मुस्लिम लीग का भरोसा जीतने और उनकी साज़िशों का पता लगाने के लिए मुसलमानों का रूप धर लिया। (वही, पृ. 86)

आज़ादी के समय मुसलमानों का रूप धरने वाले ये स्वयंसेवक क्या कर रहे थे, यह डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने साफ़ किया था, जो बाद में भारतीय गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति बने। भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को 14 मार्च 1948 को लिखे एक पत्र में प्रसाद ने लिखा: मुझे बताया गया है कि आरएसएस के लोगों की योजना गड़बड़ी फैलाने की है। उन्होंने कई लोगों को मुसलमानों के कपड़े पहनाकर और मुसलमानों जैसा रूप देकर तैयार किया है, जो हिंदुओं पर हमला करके और उन्हें उकसाकर गड़बड़ी फैलाएंगे। इसी तरह, उनमें कुछ हिंदू भी होंगे जो मुसलमानों पर हमला करेंगे और उन्हें उकसाएंगे। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच इस तरह की गड़बड़ी का नतीजा एक बड़ी आग (दंगे) भड़कने जैसा होगा। (राजेंद्र प्रसाद का 14 मार्च 1948 का सरदार पटेल को पत्र, जिसका ज़िक्र नीरज सिंह (संपादक) की किताब नेहरू-पटेल: एग्रीमेंट विदिन डिफरेंस- सेलेक्ट डॉक्यूमेंट्स एंड कॉरेस्पोंडेंस 1933-1950’, एनबीटी, दिल्ली, पृ. 43 में है)

मोहन भागवत कहते हैं कि आरएसएस सरकारी फ़ंड नहीं लेता है। यह सरासर झूठ है, नवीनतम उद्धरण भागवत के झूठ का पर्दाफ़ाश करते हैं : उन्हें सिर्फ़ भारत सरकार से, बल्कि वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी पैसे मिलते हैं। पिछले महीने (21-25 मई 2026), अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने दिल्ली में एक बड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किया, जिसकी मेज़बानी आरएसएस और बीजेपी दिल्ली सरकार ने की थी। (24 मई 2026 के टेलीग्राफ की रिपोर्ट) 

इंडियन एक्सप्रेस (18 मई 2026) की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, एनएसडीएफ (नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फ़ंड, जो बेहतरीन एथलीटों के लिए टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम जैसे जाने-माने स्पोर्ट्स मिशन को फ़ंड देता है) से करोड़ों रुपये वरिष्ठ नौकरशाहों की सुविधाओं और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में आरएसएस से जुड़ी दो संस्थाओं के लिए निकाले गए।

ऐसे अनेक मामले सामने ही नहीं पाते क्योंकि आरएसएस रजिस्टर्ड नहीं है और उसके लेन-देन की कोई जांच-पड़ताल नहीं होती। भारत और विदेशों से सैकड़ों करोड़ रुपये इकट्ठा करने और अपनी खुली और गुप्त गतिविधियों के लिए लाखों कर्मचारियों को काम पर रखने के बावजूद, आरएसएस का कोई बैंक खाता नहीं है।

नागपुर के एक मज़दूर कार्यकर्ता और एक सच्चे भारतीय देशभक्त ललन सिंह एक सीधा-सादा सा जवाब पाने के लिए न्यायपालिका के दरवाज़े खटखटा रहे हैं, कि-  आखिर किन भारतीय नियमों के तहत आरएसएस प्रमुख को जेड प्लस वीवीआईपी सुरक्षा और आरएसएस मुख्यालय को सीआईएसएफ का सुरक्षा कवच हासिल है, जिस पर टैक्स देने वाले आम भारतीयों के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं? और यह सब एक ऐसे संगठन के लिए हो रहा है, जो रजिस्टर्ड भी नहीं है?!